✍️ लेखक: विजय श्रीवास्तव
बीमारी से जूझता आदमी आज दोहरी मार झेल रहा है—एक तरफ शरीर की पीड़ा, दूसरी तरफ इलाज की लूट। प्राइवेट हॉस्पिटल पूरी तरह निरंकुश साम्राज्य बन चुके हैं, जहाँ न कोई नियम है, न कोई नैतिकता, और न ही सरकार की कोई आँख। सरकार की उदासीनता अब नीतिगत चूक नहीं, बल्कि खुली मिलीभगत जैसी दिखने लगी है।
छोटे शहर हों या महानगर, परामर्श के नाम पर डॉक्टर ₹500 से ₹5000 तक वसूल रहे हैं। वहीं डाक्टर से वीडियो कंसल्टेशन के नाम पर महानगर में तो हालात और भयावह हैं। ₹1500 से ₹4000 तक की फीस आम हो चुकी है। दिल्ली के प्रतिष्ठित गंगाराम अस्पताल में एक न्यूरोलॉजिस्ट की 10 मिनट की वीडियो कंसल्टेशन ₹3850 है। यानी बीमारी का इलाज नहीं, पहले जेब का ऑपरेशन। अस्पताल जाकर दिखाइए तो भी ₹1500–₹3500 तय है। सवाल सीधा है—क्या सरकार अंधी है या जानबूझकर आँखें मूँदे बैठी है? क्या स्वास्थ्य अब मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि केवल अमीरों की सुविधा बन चुका है?
सरकार ने प्राइवेट हॉस्पिटल्स को खुली छूट दे रखी है—जितना चाहो वसूलो, जैसे चाहो वसूलो। न कोई रेट तय, न कोई निगरानी, न कोई जवाबदेही। गरीब और मध्यम वर्ग इलाज से पहले ही हार मानने को मजबूर है, और सरकार सिर्फ तमाशबीन बनी हुई है विडंबना देखिए—एक तरफ “डिजिटल इंडिया” और “सुलभ स्वास्थ्य” के नारे, दूसरी तरफ 10 मिनट की वीडियो बातचीत भी लग्ज़री सर्विस बना दी गई है। अगर यही स्वास्थ्य मॉडल है, तो फिर सरकारी अस्पतालों की बदहाली और निजी अस्पतालों की लूट—दोनों की जिम्मेदारी सरकार से कौन छीनेगा? सरकार को तत्काल परामर्श और वीडियो कंसल्टेशन की अधिकतम दर तय करनी चाहिए, प्राइवेट हॉस्पिटल्स पर सख्त निगरानी तंत्र लागू करना चाहिए, और यह स्पष्ट करना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवा धंधा नहीं, जिम्मेदारी है।
नोट – केवल पढ़ने तक से ही काम चलने वाला नहीं है। इस मुहिम से जुड़े और अधिक से अधिक शेयर करें, जिससे यह सरकार के कान में भी सुनाई पड़े।
धन्यवाद।
