Part-2: निजी अस्पतालों की मनमानी बनाम सरकार की चुप्पी

✍️ लेखक: विजय श्रीवास्तव

AAP से राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल द्वारा सदन में उठाया गया मुद्दा कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मरीजों की सामूहिक पीड़ा की आवाज़ है। निजी अस्पतालों की मनमानी अब अपवाद नहीं, बल्कि एक संगठित लूट तंत्र बन चुकी है—और सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकार इस पूरे खेल पर आंखें मूंदे बैठी है।

इलाज से पहले एडवांस: बीमारी नहीं, बैंक बैलेंस देखा जाता है

₹20,000 से ₹1,00,000 तक का एडवांस बिना इलाज शुरू हुए मांगना, सीधे-सीधे यह साबित करता है कि आज अस्पतालों में मानवता नहीं, मुनाफा प्राथमिकता है। सवाल यह है कि आपात स्थिति में गरीब या मध्यम वर्ग का मरीज यह रकम कहां से लाए? क्या इलाज अब केवल उन्हीं के लिए है जिनकी जेब भारी है? आपात स्थिति में पड़ा मरीज तड़प रहा है, पर सवाल पूछा जाता है—“कैश है या कार्ड?” यह न सिर्फ़ अमानवीय है, बल्कि संविधान के उस अधिकार का खुला मज़ाक है जो जीवन को मौलिक अधिकार मानता है। सवाल उठता है—अगर पैसे के बिना इलाज नहीं, तो फिर सरकार “सबका साथ, सबका विकास” किस विश्वास के साथ और किसे बरगला रही है?और सरकार?वह या तो नोटिफिकेशन के जंगल में खोई है,या फिर कॉरपोरेट हेल्थ माफ़िया के सामने नीति-निर्माण को घुटनों पर बैठा चुकी है।

कमरे का किराया: बीमारी का इलाज या मजबूरी की नीलामी?

निजी अस्पतालों के कमरे—₹8,000, ₹15,000, ₹25,000 प्रतिदिन।
यह अस्पताल है या बीमारी के नाम पर चलाया जा रहा 5-स्टार रैकेट ?फर्क सिर्फ़ इतना है कि होटल में आप खुशी से जाते हैं, अस्पताल में लाचार होकर। मजबूरी को विलासिता के दाम पर बेचना केवल लालच नहीं—यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है और सबसे खतरनाक बात—कमरे के किराए से तय होता है आपका इलाज, कौन-सी दवा, कौन-सी जांच, कौन-सा डॉक्टर।
यानी बीमारी समान है, पर इलाज वर्ग आधारित।

सरकार की चुप्पी: अक्षमता नहीं, सहभागिता

यह मान लेना भोलेपन होगा कि सरकार को यह सब पता नहीं। सवाल यह नहीं कि सरकार जानती है या नहीं, सवाल यह है कि सरकार कर क्या रही है? क्या निजी अस्पतालों के लिए कोई सख़्त रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है?क्या इमरजेंसी में एडवांस पर रोक है? क्या कमरे के किराए की कोई अधिकतम सीमा तय है? जवाब एक ही है—नहीं। यह चुप्पी मासूम नहीं, यह कॉरपोरेट लूट में मौन साझेदारी है। आज भारत में समस्या यह नहीं कि अस्पताल कम हैं, समस्या यह है कि इलाज इंसान के लिए नहीं, मुनाफ़े के लिए हो रहा है। स्वाति मालीवाल की आवाज़ दरअसल उस सवाल की गूंज है—क्या इस देश में ज़िंदा रहने का अधिकार भी अब EMI पर मिलेगा? अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो आने वाले समय में अस्पताल इलाज के नहीं, कर्ज़ और कब्र—दोनों के एंट्री पॉइंट बन जाएंगे।

यह सिर्फ़ चेतावनी नहीं,
एक सख़्त सामाजिक आरोप है।

आज सबको मुखर होने की जरुरत है, अन्यथा इस तंत्र के शिकार आप भी हो सकते है। इस पोस्ट को अधिक से अधिक लोगों को भेजिए।
धन्यवाद।

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