देश में प्रतियोगी परीक्षाएं अब प्रतिभा की नहीं, बल्कि अव्यवस्था और अविश्वास की पहचान बनती जा रही हैं। लाखों युवा वर्षों की मेहनत, परिवारों की उम्मीदें और करोड़ों रुपये की कोचिंग के बाद परीक्षा कक्ष तक पहुंचते हैं, लेकिन पेपर लीक की एक खबर उनके सपनों पर पानी फेर देती है। महाराष्ट्र में टीईटी परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद परीक्षा स्थगित होना इस गंभीर संकट की एक और कड़ी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच के दौरान पूर्व शिक्षा आयुक्त के ठिकानों से पांच सूटकेसों में करीब 2 करोड़ 40 लाख रुपये नकद और भारी मात्रा में आभूषण बरामद होने का दावा सामने आया। यदि जांच में यह सब सही साबित होता है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि उन लाखों युवाओं के विश्वास की हत्या है, जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा की तैयारी की थी।
सवाल यह भी है कि बार-बार पेपर लीक की घटनाएं सामने आने के बावजूद जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? सरकार लगातार नई योजनाओं, नए कानूनों और सख्त कार्रवाई के दावे करती है, लेकिन हर कुछ महीनों बाद किसी न किसी परीक्षा पर सवाल खड़े हो जाते हैं। युवाओं को यह महसूस होने लगा है कि व्यवस्था दोषियों पर नहीं, केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देती है।
विपक्ष लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से नैतिक जिम्मेदारी लेने की मांग करता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है। लेकिन छात्रों का सवाल सीधा है—यदि हर बार पेपर लीक के बाद ही कार्रवाई होगी, तो उनकी वर्षों की मेहनत की भरपाई कौन करेगा? हाल के वर्षों में देशभर में अनेक बड़ी परीक्षाएं विवादों और पेपर लीक के आरोपों से प्रभावित रही हैं, जिससे परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हुआ है।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना भी है। जब प्रतियोगी परीक्षाएं ही संदेह के घेरे में हों, तो केवल गिरफ्तारियों और बरामदगी की खबरों से भरोसा वापस नहीं आएगा। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें पेपर लीक होने के बाद कार्रवाई नहीं, बल्कि पेपर लीक होना ही असंभव हो जाए। यही करोड़ों अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी मांग है।
