अब समय है जन आंदोलन का इसके लिए हर घर से आवाज उठें। आप भी आन्दोलन का हिस्सा बनिए और अधिक से अधिक लाइक, कमेंट और शेयर करिएंI
प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर आज लाखों बेटियों को अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर परीक्षा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकारें भर्ती निकाल देती हैं, लेकिन यह नहीं सोचतीं कि एक लड़की जब दूसरे जिले या दूसरे शहर परीक्षा देने जाती है तो उसे किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
पुलिस भर्ती हो, शिक्षक भर्ती हो, रेलवे हो या अन्य कोई प्रतियोगी परीक्षा। परीक्षा के दिनों में ट्रेनों और बसों की हालत किसी आपदा से कम नहीं होती। भीड़ इतनी भयावह होती है कि खड़े होने तक की जगह नहीं मिलती। ऐसे माहौल में सबसे ज्यादा परेशानी और असुरक्षा का सामना लड़कियों को करना पड़ता है।
कल ही में पुलिस भर्ती परीक्षा देने जा रही वाराणसी की एक बेटी और उसके पिता की जौनपुर परीक्षा देने जाते समय सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो अभ्यर्थियों को अनावश्यक रूप से दूर-दराज के केंद्रों पर भेजती है। इसी तरह की एक घटना इसी सप्ताह लखनऊ में परीक्षा देने गई दूसरे जिले की एक लड़की के साथ टैम्पों चालक के द्धारा दुष्कर्म के प्रयास की घटना भी सामने आई। ऐसी घटनाओं की एक लम्बी लिस्ट है। जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। बेटियों को रोजगार के नाम पर क्या उनके सुरक्षा के साथ इस तरह का खिलवाड़ करना न्यायसंगत है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि परीक्षा केंद्र तक पहुंचने और वापस घर लौटने का सफर कई बार बेटियों के लिए जोखिम भरा बन जाता है। सबसे बडी बात यह है कि कई बार परीक्षा के रदद होने या लिक होने के कारण दुबारा से बेटियों के परीक्षा के लिए दूसरे जिले में जाना पड़ता है। जिससे उन्हें तथा परिवार के लागों को आर्थिक बोझ का शिकार होना पड़ता है। कई बार परीक्षाओं के लिक होने या रदद होने से लड़के ल़डकिया आत्महत्या तक कर लेते हैं। अभी हाल में नीट की परीक्षा रदद होने से आधा दर्जन बच्चों ने आत्महत्या तक कर ली है।
आज एक गरीब परिवार की बेटी को परीक्षा देने के लिए किराया, खाना, रहने की व्यवस्था और सुरक्षा की चिंता अलग से करनी पड़ती है। कई परिवार आर्थिक कारणों से अपनी बेटियों को परीक्षा तक नहीं दिला पाते। क्या यह प्रतिभा के साथ अन्याय नहीं है? क्या यह किसी भी तरह से न्यायसंगत है।
सरकार से हमारी मांग
1-सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में महिला अभ्यर्थियों को प्राथमिकता के आधार पर उनके अपने जिले में परीक्षा केंद्र दिया जाए। इसे अनिवार्य किया जाना चाहिए।
2-परीक्षा केंद्र आवंटन में महिला अभ्यर्थियों की सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता बनाई जाए। जांच के नाम पर महिलाओं को बेवजह परेशान न किया जाये।
3-परीक्षा के दिनों में विशेष परिवहन और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, साथ ही उन्हें रेल व बस में छूट का भी प्रावधान हो।
अब समय है जन आंदोलन का
इसके लिए हर घर से आवाज उठें। आखिर क्यों जरूरी है लड़कियों के लिए अपने जिले में परीक्षा केंद्र?
यह किसी एक लड़की, एक परिवार या एक जिले का मुद्दा नहीं है। यह देश की करोड़ों बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और भविष्य का सवाल है।
अगर आप भी मानते हैं कि बेटियों को परीक्षा देने के लिए असुरक्षा और परेशानियों का सामना नहीं करना चाहिए, तो इस आवाज को बुलंद कीजिए।
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हमारी मांग स्पष्ट है “बेटी पढ़ेगी, बेटी आगे बढ़ेगी, लेकिन सुरक्षित माहौल में” अपने जिले में परीक्षा केंद्र देना सरकार की जिम्मेदारी है I
